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उमेश वर्मा - कला का सच्चा और निश्छल स्वरूप

22 hours ago
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- राजेश एकनाथ


उमेश वर्मा
उमेश वर्मा
"प्राण से भरी रचना अपने भीतर एक जीवित चेतना लेकर चलती है।"

 प्रभाकर कोलते सर के एक चित्र को देखकर मुझे उमेश वर्मा सर की, उनके चित्रों की याद हो आई, यह अपने आप में मेरे लिए अजब संयोग रहा। हालांकि उनके ऊपर उनकी कला पर बहुत कम बात हुई है...

 

कभी-कभी किसी एक जगह जाकर हमारी विचार प्रक्रिया या कला प्रक्रिया एक हो जाती है तो यह अनुभव कला की उस पारलौकिक शक्ति का प्रमाण है, जहाँ दो भिन्न कालखंडों और परिवेशों के सृजक किसी एक वैश्विक चेतना के धरातल पर आकर एक मनोवस्था में आ जाते हैं।


उमेश वर्मा जी और प्रभाकर कोलटे के अंतिम चित्रों में से एक चित्र में दिखने वाला रेखाओं का जटिल जाल (ग्रिड) और खगोलीय तत्वों जैसा ताना-बाना इसी का प्रमाण है। यह संरचनात्मक प्रक्रिया यह सिद्ध करती है कि कैनवास पर खींची गई रेखाएँ और उनके किसी साझा बिंदु पर मिलने से निर्मित होने वाला ज्यामितीय संरचना समय की सीमाओं को लांघकर एक शाश्वत दृश्य भाषा का निर्माण करता है। यहाँ काल का भेद मिट जाता है और शुद्ध सृजन शेष रह जाता है। जबकि दोनों कलाकारों की विचार प्रक्रिया, कला प्रक्रिया बिल्कुल अलग होने के बावजूद अनजाने में ही सही, पर कैनवास पर एक ही बिंदु पर आकर मिली है।



​यह स्मरण में एक विशिष्ट, साझा भावभूमि और सुदृढ़ मूल्य बोध इसमें जीवन तथा जगत को लेकर चिंतन की एक ऐसी उभयनिष्ठ दृष्टि क्रियाशील थी, जिसमें संपूर्ण चराचर जगत के एक ही सूत्र में पिरोए होने का नित्य, स्वतः प्रमाणित और अनुभूत ज्ञान विद्यमान था।

 

तो उनकी बात की जाए जो कलाकार मंगल गान गाता था...  "गावहिं मंगल मंजुलबानी।  सुनि कलरव कलकंठ लजानी" ॥  - गोस्वामी तुलसीदास

 

मुझे वे शुरू में बेबुझ लगते थे, शुरुआत में जो इंसान अपनी सफेद दाढ़ी, खादी के कुर्ते और झोले में एक साधारण बुजुर्ग जैसा दिखाई देता था, वे असल में एक बेहद गंभीर और दार्शनिक स्वभाव के धनी कलाकार थे। उनका यही दार्शनिक रूप उनके चित्रों के केंद्र में प्रकट होता है, जहाँ ब्रह्मांड की बिखरी हुई ऊर्जा और रेखाएँ मिलकर एक मुख्य केंद्र बिंदु पर आकर ठहर जाती हैं। उमेश वर्मा जी को लोक संगीत के प्रति रूमानी रुझान था, वे मूड में रहने तो गाते भी खूब थे ।


हे री सखी मंगल गावो री, धरती अंबर सजावो री! उतरेगी आज मेरे पिया की सवारी, हे री कोई काजल लाओ री, मोहे काला टीका लगाओ री! रंग मिले, नए-नए ढंग खिले, खुशी आज द्वारे मेरे डाले है डेरा! पीहू-पीहू पपिहा रटे, कुहू-कुहू कोयल जपे, आँगन-आँगन है परियों ने घेरा! अनहद नाद बजाओ रे सब मिल,आज मेरे पिया घर आवेंगे!

ऋतुओं और मासों के अनुसार उनके पास गीतों की एक संपूर्ण खजाना था, जिसे वे अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते थे। उनकी गायकी और उनका संवाद एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी यह सहज प्रतिभा, उनका यह गहन लोक-जुड़ाव, आज एक बहुत बड़े शून्य का आभास कराता है।


यह अनुभव साफ तौर पर दिखाता है कि कला की दुनिया में कुछ भी अकारण नहीं होता। जब आज का कोई चित्र अतीत के किसी विस्मृत कलाकार की याद दिला दे, तो वह मेरे लिए , शायद कला जगत के लिए भी, एक अनमोल क्षण होगा।

 

उमेश वर्मा जी से पहली मुलाकात 1998 में गढ़ी आर्ट सेंटर में हुई मैं तब अक्सर हिम्मत शाह जी के काम देखने जाता था। उमेश सर से मिलने में मैं घबराता था उसके पीछे एक कहानी मैने सुन रखी कि माँ के आकस्मिक निधन के समाचार ने उन्हें गहरे मानसिक आघात से भर दिया। तत्कालीन दुर्लभ साक्षात्कारों से यह ज्ञात होता है कि इस शोक की विकलता में वे अपना पासपोर्ट लेकर भारतीय दूतावास पहुँचे और उसमें अपनी दिवंगत माँ का नाम अंकित करवा लिया। यह उस दौर की प्रशासनिक सहृदयता का एक अनुपम उदाहरण था। इस मानसिक उद्वेलन के परिणामस्वरूप उन्हें जापान में कुछ समय एक मानसिक चिकित्सालय में व्यतीत करना पड़ा, जहाँ से आंशिक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के उपरांत उन्हें भारत वापस भेज दिया गया। सफदरजंग अस्पताल में उनका आगे का उपचार संपन्न हुआ। 1968 में मंजीत बावा जो उनके मित्र रहे , के आत्मीय प्रयासों से उनका विवाह संपन्न हुआ, जिसके पश्चात उन्होंने पूर्ण निष्ठा के साथ चित्रकला को अपनी अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम बनाया और ललित कला अकादमी के गढ़ी स्टूडियो को अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना।

 

आशीष सिंह राणा को एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया था कि,

 

"मेरे दोस्त और परिवार यही सोचते रहे कि मैं एक पागल व्यक्ति हूँ और एक ऐसा मानसिक मामला हूँ जो ठीक होने से परे है। सौभाग्य से मेरे लिए, एक या दो साल बाद मेरा परिचय डॉ. एस. दत्ता राय से हुआ जो एक विश्व प्रसिद्ध मनोचिकित्सक हैं। तब से वे मेरे सलाहकार हैं। मैं उन्हें गढ़ी में अपने स्टूडियो में एक पेंटिंग दिखाने के लिए ले गया और उनसे कहा कि वे मुझे बताएं कि यह पेंटिंग है या नहीं। "अगर यह किसी काम की नहीं है, तो मैं तुरंत हमेशा के लिए पेंटिंग करना बंद कर दूँगा।" उन्होंने मुझे एक शनिवार को बुलाया और अपने कक्ष में मुझे बेहतरीन पेंटिंग के लिए बधाई दी। उनकी राय में, मुझे लगा कि हर कोई एक मानसिक मामला है क्योंकि हर किसी के पास एक मानस (psyche) होता है। "आप एक पेंटर हैं। यदि आप अपने काम के प्रति अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में सक्षम हैं तो यह मेरे लिए बिल्कुल ठीक है।"

 

अवनि सेन कहा करते थे, "जो रेखा तुम लिखते हो वह पहले ही लिखी जा चुकी है और इतिहास बन चुकी है। तुम इसे हटा नहीं सकते। तुम इसे मिटा नहीं सकते। यदि तुम दूसरी रेखा चाहते हो तो उसी रेखा पर उसी वेग के साथ दूसरी रेखा खींचो जिसके साथ तुमने पिछली रेखा खींची थी। इतिहास को ध्वस्त नहीं किया जा सकता।"

 

वे कहा करते थे, "बिना वेग और पागलपन के, आप अपने द्वारा चुने गए किसी भी कार्यक्षेत्र के साथ न्याय नहीं कर सकते। आप पेंट करना चाहते हैं। अपने वेग, बहुत सारे काम, रेखा, रंग के क्षेत्र, संयोजन, संतुलन, संगीत और जो कुछ भी आप कहना चाहते हैं, उसका सहारा लें।"

 

वे मुझे उस समय की याद दिलाते हैं जब दिल्ली का कला जगत मेरे लिए एक नया और अनजाना क्षेत्र था, वरिष्ठ कलाकारों से मिलना ,जानना, सीखना, शुरू से मेरे स्वभाव का हिस्सा रहा है। उमेश सर के स्टूडियो में प्रवेश करना, एक अलग ही वैचारिक धरातल पर प्रवेश करने जैसा था। उनके सोचने और संवाद करने का ढंग, उनकी चिंतन-प्रक्रिया, किसी भी समकालीन कलाकार से सर्वथा भिन्न थी। उनके शब्दों में एक ऐसा गहन अर्थ छिपा होता था कि अक्सर यह तीव्र इच्छा होती थी कि उन्हें शब्दशः अंकित कर लिया जाए। लेकिन कभी ऐसा संभव नहीं हुआ, इसके लिए मेरा अपना आलसी स्वभाव भी एक बड़ा रोड़ा था।

 

मेरे कलाकार मित्र पंकज मानव का स्टूडियो उनके पास ही था वे याद करते हुए कहते है कि,

 

"उमेश वर्मा जी का ज़िक्र हुआ तो उनकी रहस्य से ओत-प्रोत रचनाएँ याद आ गईं। विज्ञान के छात्र होने की वजह से पढ़ाई उनके कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। शब्दों को कुरेदना, संधि विच्छेद करना, उनके अनेक अर्थों की खोज करना और विचारों की परतों को खोलना उनका स्वभाव था, जो उनकी पेंटिंग्स में भी प्रतिबिंबित होता था। वे एक चित्रकार होते हुए भी किसी वैज्ञानिक की तरह काम करते थे। उनके लिए चित्र बनाना एक गहन बौद्धिक और संवेदनात्मक अन्वेषण था।" 

 

"गढ़ी में उनके साथ कार्यरत रहते हुए मुझे उन्हें और उनके काम को क़रीब से देखने का अवसर मिला। उनका समर्पण, उनकी कार्यप्रणाली और उनकी वैचारिक गहराई मेरे लिए सदैव प्रेरणास्रोत रही।"

- पंकज मानव , चित्रकार , शिल्पकार , दिल्ली

 

ग्वालियर का वह शिविर 2007 का वह समय, जब कलात्मक संवादों के बीच अचानक जीवन के गहरे सत्य सामने आ जाते थे। शराब मुझे चढ़ गई थी उस अत्यधिक प्रभाव में मैंने अपने आप को 'राक्षस' प्रवृति का कहा था , तब उमेश वर्मा जी ने अपनी उसी चिरपरिचित मुस्कान और दार्शनिक गहराई के साथ ,'राक्षस,' शब्द की जो परिभाषा मुझे समझाई, उसे उनकी वैचारिक सोच के आलोक में इस प्रकार सहजता से समझा जा सकता है:

वर्मा जी के चिंतन के अनुसार, 'राक्षस' शब्द का मूल अर्थ संस्कृत व्याकरण और प्राचीन दर्शन के दृष्टिकोण से, रा याने प्रकाश , 'राक्षस' शब्द 'रक्ष्' धातु से आता है, जिसका सीधा संबंध 'रक्षा करने वाले' या 'संजोकर रखने वाले' से है।

 

उन्होंने बताया कि जो अपनी संस्कृति, अपनी मौलिकता, अपने भीतर की कला और अपने लोक-जीवन को बाहरी दुनिया के बाज़ार वाद से बचाकर रखता है, वही वास्तविक रक्षक या 'राक्षस' है। जब मैंने अपनी प्रवृति को राक्षस कहा, तो उन्होंने उसे एक नकारात्मक भाव मानने के स्थान पर उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जो अपनी आंतरिक शुद्धता और कलात्मक मूल्यों की रक्षा के लिए समाज के बने-बनाए नियमों से लड़ने को तैयार है। शायद उनका आशय यह रहा होगा कि कला जगत की चालाकियों और दिखावे के बीच अपने भीतर के भोलेपन और बेलौस स्वभाव को बचाए रखना ही सबसे बड़ी 'रक्षा' है।

 


एक और किस्सा द्रोण और एकलव्य वे अक्सर सुनाते थे, वे इस प्रसंग को एक नवीन और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखते थे। जस का तस तो मुझे याद नहीं लेकिन कोशिश करता हूं दोस्त विद्या सागर सिंह से बात करते हुए याद दिलाया ...

 

ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं में अंगूठा दान करने की घटना को प्रायः एक क्रूर सामाजिक ताने-बाने या राजनीतिक विवशता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके विपरीत, इस घटना के भीतर छिपे तकनीकी और प्रतीकात्मक पहलू को समझना एक अत्यंत सकारात्मक दृष्टि प्रदान करता है।

 

इस व्यवस्था को धनुर्विद्या के एक बड़े तकनीकी रूपांतरण के रूप में समझा जा सकता है। पारंपरिक रूप से क्षत्रिय योद्धा धनुष की प्रत्यंचा को खींचने के लिए अंगूठे का मुख्य रूप से प्रयोग करते थे। द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा मांगकर उसे एक ऐसी विधा की ओर अग्रसर किया, जहाँ अंगूठे की आवश्यकता समाप्त हो गई। इसके परिणामस्वरूप आदिम जाति के धनुर्धरों को बाण चलाने का एक सर्वथा भिन्न और अभिनव ढंग प्राप्त हुआ, जिसमें शेष दो उंगलियों की सहायता से प्रत्यंचा को खींचकर छोड़ा जाता था। आज वर्तमान की आधुनिक धनुर्विद्या भी इसी उंगलियों वाले वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित दिखाई देती है।

 

इस घटना के पीछे एक चतुर और दूरदर्शी शिक्षक का कूटनीतिक प्रयास भी छिपा हो सकता है। राजघराने के शिष्यों को शिक्षा देने के कारण द्रोणाचार्य पर तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों, राज्याश्रय के नियमों और सामाजिक दबावों का भारी नियंत्रण था। वे राजकीय अनुशासन से बंधे हुए थे। इस कठोर व्यवस्था के बीच एक अत्यंत प्रतिभाशाली और योग्य शिष्य को विद्या प्रदान करना एक बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने एक गूढ़ मार्ग चुना।

 

उन्होंने एकलव्य की प्रतिभा को तात्कालिक राजसी कोप और क्रूर सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से बचाने के लिए यह आवरण तैयार किया। अंगूठा लेने के इस दृश्य कृत्य ने राजनेताओं और समाज के प्रभावशाली वर्ग को संतुष्ट कर दिया कि अब वह चुनौती नहीं रहा। इसके साथ ही, एकलव्य को एक ऐसी नई और अद्वितीय तकनीक मिल गई जिसने उसकी क्षमता को और अधिक निखार दिया। यह रणनीति एक योग्य शिक्षक की उस आंतरिक व्याकुलता को दर्शाती है, जहाँ वह सत्ता के गलियारों को भनक लगे बिना अपनी श्रेष्ठ विद्या को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर देता है। इस प्रकार यह कथा गुरु-शिष्य संबंध के एक अत्यंत रचनात्मक, संरक्षणात्मक और व्यावहारिक पक्ष को उजागर करती है।

 

इन संवादों का जिक्र जरूरी इसीलिए हो जाता है, इससे कलाकार का स्वभाव पता चलता है - उन्मुक्त हंसने वाले, स्वछंद बेखौफ अपनी बात कहने वाले इस कलाकार को एक खास दूरी से अवलोकन करना कला में किसी कलाकार का प्रमाणिकता को देखने के समान है, मान लो कि कभी वे किसी बात पर नाराज भी हो जाए तो दूसरे ही स्वयं आगे होकर बात कर लेते। समकालीन कला में उमेश वर्मा जी का मूल्यांकन पूर्णतः उनकी कलात्मक यात्रा, सृजन-प्रक्रिया और उनके द्वारा स्थापित प्रतिमानों के आलोक में ही प्रासंगिक है। वे एक ऐसे समर्पित प्रखर आधुनिकतावादी चित्रकार थे, जिनका संपूर्ण जीवन, कला के विभिन्न आयामों की खोज और उसकी मौलिकता को बनाए रखने के संघर्ष में व्यतीत हुआ। सभी सच्चे आधुनिकतावादियों के समान उनके संपूर्ण जीवन और रचनात्मक संसार में एक विलक्षणता परिलक्षित होती थी। उन्होंने जगदीश डे, मनजीत बावा, सतीश गुजराल, कृशन खन्ना और एम.एफ. हुसैन जैसे दिग्गजों के समानांतर अपनी कला-यात्रा को गति दी।

 

उत्तर प्रदेश में जन्मे वर्मा से उनके परिवार को एक चिकित्सक बनने की अपेक्षा थी। मेडिकल कॉलेज की शिक्षा के दौरान भी उनके भीतर का विद्रोही कलाकार जाग्रत रहा। अंततः उन्होंने इस मार्ग का परित्याग करने का एक साहसी निर्णय लिया। चिकित्सा विज्ञान को पीछे छोड़ते हुए वे अपने लेखक और संपादक भाई के साथ दिल्ली आ गए। यहाँ उन्होंने दिल्ली पॉलिटेक्निक के कला विभाग में प्रवेश लिया और चित्रकला को अपनी साधना का मुख्य केंद्र बनाया।

 

उमेश वर्मा जी का मानना था कि कि कला व्यक्ति के भीतर निवास करती है और किसी संस्थान में आप केवल विभिन्न कौशल और तकनीक सीखते हैं। बी सी सान्याल, दासगुप्ता, सैलोज़ मुखर्जी, दिनकर कौशिक, सोमनाथ होरे, जया अप्पासामी, बीरेन दे, जगमोहन चोपड़ा, राजेश मेहरा, नरेन श्रीवास्तव और कमल सेन जैसे कुछ बहुत ही प्रतिष्ठित प्रोफेसरों के सानिध्य में तथा साथी कलाकारों के प्रोत्साहन में यह यात्रा जारी रही।

 

अपनी औपचारिक शिक्षा पूर्ण करने से पूर्व ही वे दिल्ली के कला परिदृश्य में एक अत्यंत सक्रिय संगठनकर्ता के रूप में स्थापित हो चुके थे।

 

एक प्रतिष्ठित छात्रवृत्ति के अंतर्गत जापान प्रवास के दौरान उन्होंने पारंपरिक लोक चित्रकला की अपेक्षा लोक मृदभांड कला (सिरेमिक आर्ट Ceramic/pottery) का गहन और तकनीकी अध्ययन किया। इस वैश्विक प्रवास ने उनके कलात्मक दृष्टिकोण को और अधिक व्यापक बनाया। भारत लौटने के उपरांत उन्होंने ललित कला अकादमी के गढ़ी स्टूडियो (Garhi Art Centre) को अपनी कर्मस्थली बनाया, जहाँ कई दशकों तक उनकी सृजन-प्रक्रिया अनवरत चलती रही। यहाँ रहकर उन्होंने माध्यमों की सीमाओं को तोड़ते हुए दृश्य कला में नए प्रयोग किए।

 

दिल्ली की कलात्मक भूमि पर उमेश वर्मा की पहचान एक उत्कृष्ट सृजक के साथ-साथ एक दूरदर्शी संगठनकर्ता के रूप में स्थापित हुई। उन्होंने अपने समकालीन प्रतिभावान चित्रकारों के साथ मिलकर 'द सिक्स' (The Six) नामक एक प्रगतिशील कला समूह का गठन किया। उसमें अन्य कलाकार जगदीश डे, मंजीत बावा, नीलमोनी चटर्जी, दुर्गा प्रसाद और गोकुल डेंबी थे। 60 से 80 के दशक की शुरुआत में एआईएफएसीएस (AIFACS gallery) में समूह "द सिक्स" की दो या अधिक प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं।

 

सत्तर और अस्सी के दशक का भारतीय कला समाज एक अत्यंत उथल-पुथल और वैचारिक मंथन से गुजर रहा था। उस कालखंड में कला समीक्षकों, विचारकों और साथी कलाकारों के बीच इस बात पर गंभीर चिंतन चल रहा था कि भारतीय आधुनिक कला को अपनी मौलिक पहचान कैसे दी जाए। कला जगत इस बात को लेकर पूरी तरह सहमत था कि कला को पश्चिमी प्रवृत्तियों के अनुकरण से मुक्त होना चाहिए। तत्कालीन कला चिंतन में यह विचार सर्वोपरि था कि चित्रकला को बाहरी यथार्थ के चित्रण से आगे बढ़कर मनुष्य के आंतरिक मानस, सांस्कृतिक विरासत और लोक जीवन को अभिव्यक्ति देनी चाहिए। इस वैचारिक पृष्ठभूमि में जगदीश डे, मंजीत बावा, निलमोनी चटर्जी, दुर्गा प्रसाद और गोकुल डेंबी के चित्रों को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी प्रयास के रूप में देखा गया। कला समाज इनके इस नए मार्ग को बहुत सम्मान, कौतूहल और सराहना की दृष्टि से देखता था। समीक्षकों का मानना था कि इन कलाकारों ने अपनी स्थानीय कला परंपराओं को वैश्विक आधुनिकता के साथ बहुत सहजता से संबद्ध किया है।

 

इन कलाकारों के काम की खासियत और उनका महत्व भारतीय कला इतिहास में अक्षुण्ण है। मंजीत बावा ने कला जगत को एक सर्वथा नवीन रंग-चेतना से परिचित कराया। उन्होंने ब्रिटिश अकादमिक शैली की छाया-प्रकाश पद्धति को पूरी तरह त्याग दिया। उनके चित्रों की मुख्य विशेषता सपाट और प्रखर रंगों का प्रयोग तथा उनके बीच तैरती हुई सुडौल आकृतियाँ हैं। वे भारतीय पौराणिक कथाओं, सूफी दर्शन और पशु-पक्षियों के साथ मनुष्य के सहज सह-अस्तित्व को कैनवास पर उतारते थे। लोक कला की तरलता और आधुनिक अमूर्तन के बीच एक काव्यात्मक सेतु का निर्माण करना उनकी कला का सबसे बड़ा महत्व है।


जगदीश डे के चित्रों में एक रहस्यमयी, स्वप्निल और काल्पनिक संसार की झलक मिलती है। उनकी रूपात्मक बनावट में एक विशेष प्रकार का ठहराव और आध्यात्मिक शांति दिखाई देती है। वे मानवीय आकृतियों और प्रकृति के तत्वों को इस प्रकार संयोजित करते हैं कि चित्र किसी अन्य लोक की कथा जैसा प्रतीत होने लगता है। बारीक रेखाओं, पारदर्शी परतों और रंगों के अत्यंत सूक्ष्म उपयोग के कारण उनका काम दर्शक को एक अंतर्मुखी यात्रा पर ले जाता है।

 

निलमोनी चटर्जी के चित्रों में बंगाल स्कूल के सौम्य प्रभाव के साथ-साथ एक आधुनिक तार्किकता का सुंदर मिश्रण दिखाई देता है। उनकी कला की सबसे बड़ी विशेषता रेखाओं का सुदृढ़ अनुशासन और आकृतियों की भावप्रवणता है। उन्होंने अपने समय के सामाजिक ताने-बाने, मानवीय संघर्षों और लोक जीवन को बहुत ही सघनता से चित्रित किया। तत्कालीन कला समाज में उनकी पहचान एक ऐसे वैचारिक कलाकार के रूप में थी, जो अपनी कला के माध्यम से समय की धड़कन को पकड़ने का सफल प्रयास करते थे। 

 

दुर्गा प्रसाद की कला में जमीन से जुड़ाव और लोक जीवन के प्रति एक गहरा अनुराग परिलक्षित होता है। उनके चित्रों के रूप और विषय-वस्तु पारंपरिक भारतीय जीवन, उत्सवों और लोक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। उन्होंने लोक कला के पारंपरिक आकारों को समकालीन कला की भाषा में रूपांतरित करने का अत्यंत सराहनीय कार्य किया। कला की शास्त्रीयता और लोकधर्मिता के बीच के अंतर को समाप्त करते हुए एक नई दृश्य-संस्कृति को जन्म देना उनका मुख्य महत्व है।

 

गोकुल डेंबी की कला में कश्मीरी प्रकृति, वहाँ के प्रकाश और वादियों की रंगत का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उनके चित्रों की खासियत प्रकृति का हूबहू अंकन करने के स्थान पर उसके भीतर छिपी ऊर्जा और सौंदर्य का अमूर्त रूपांतरण करना है। उन्होंने रंगों की सघनता और धरातलीय बुनावट के माध्यम से कैनवास पर एक अद्भुत गत्यात्मकता पैदा की। प्रकृति को एक नए दार्शनिक और आधुनिक दृष्टिकोण से देखने की उनकी अनूठी कला-दृष्टि के कारण कला जगत में उनका स्थान अत्यंत विशिष्ट है।

 

जैसा कि कलाकार का कहना है..

 "कला मेरे व्यक्तित्व को व्यक्त करने का माध्यम है "

 

वर्मा का संपूर्ण रचना संसार अमूर्तता और आधुनिक रूपाकारों के मध्य एक सुंदर संतुलन स्थापित करता है। वे विशुद्ध अमूर्तता के आग्रही होने से बचते रहे, क्योंकि वे मानव समाज और उसकी अंतर्निहित पीड़ाओं से अपना संपर्क विच्छेद करने के पक्ष में कदापि नहीं थे। दिल्ली का वह ऐतिहासिक दौर जब राजनीतिक और सामाजिक रूप से स्वयं को परिभाषित कर रहा था, और सांस्कृतिक सत्ता विशिष्ट वर्ग के हाथों में केंद्रित थी, तब वर्मा ने आम जनमानस के साथ अपनी एकात्मकता स्थापित की। उनके चित्रों में साधारण मनुष्यों का संघर्ष और उनकी जिजीविषा मुख्य विषय बनकर उभरी। एक विशिष्ट कालखंड में उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी चित्रों का निर्माण किया, जिसमें ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों और खगोलीय तत्वों की खोज की गई थी।

 

उमेश वर्मा के चित्र देखते हुए मुझे पीट मोंड्रियन भी याद आते है उनकी कला के केंद्र में एक बेहद गहरी और विचारशील ज्यामितीय व्यवस्था दिखाई देती है। उन्होंने अपने चित्रों से घुमावदार रेखाओं को पूरी तरह दूर कर दिया। उनके कैनवास क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर काली रेखाओं के आपसी मिलन से निर्मित होते हैं, जो एक-दूसरे को समकोण पर काटते हुए आयताकार और वर्गाकार ग्रिड तैयार करते हैं। इन ग्रिडों के भीतर वे लाल, नीले और पीले जैसे प्राथमिक रंगों के साथ सफेद, काले और ग्रे रंगों का संयोजन करते हैं। इस पूरी संरचना में संतुलन को गणितीय या सममित रखने के बजाय वे असममित ढंग से व्यवस्थित करते हैं। इसके कारण कैनवास की सपाट सतह पर बिना किसी त्रि-आयामी भ्रम या गहराई के एक अनूठा दृश्य संतुलन स्थापित होता है।

 

इस विशिष्ट ज्यामितीय विन्यास को लेकर मोंड्रियन के अपने मौलिक और दार्शनिक विचार थे। वे कला को प्रकृति के बाहरी रूपों की नकल से मुक्त करना चाहते थे। उनका मानना था कि वस्तुओं के दृश्य रूप परिवर्तनशील होते हैं, इसलिए सत्य तक पहुँचने के लिए इन बाहरी रूपों को विखंडित करना अनिवार्य है। सीधी रेखाएँ और प्राथमिक रंग उनके लिए इसी अपरिवर्तनीय और शाश्वत सार्वभौमिक सत्य को प्रकट करने के माध्यम थे।

 

वे इन रेखाओं को ब्रह्मांड की दो महान विपरीत शक्तियों के प्रतीक के रूप में देखते थे। उनके चिंतन में ऊर्ध्वाधर रेखा आध्यात्मिक ऊर्जा, सक्रियता और पुरुषत्व को दर्शाती है, जबकि क्षैतिज रेखा सांसारिकता, स्थिरता और स्त्रीत्व का प्रतिनिधित्व करती है। इन दोनों रेखाओं का परस्पर प्रतिच्छेदन जीवन के परम संतुलन और समरसता को व्यक्त करता है। मोंड्रियन कला को कलाकार के व्यक्तिगत राग-द्वेष और अहं से पूरी तरह मुक्त रखने के पक्षधर थे, ताकि दर्शक एक निर्वैयक्तिक और शुद्ध आनंद का अनुभव कर सके। उनका यह दूरदर्शी विचार भी था कि आने वाले समय में कला दीर्घाओं की सीमाओं से बाहर निकलकर सीधे मानव जीवन, वास्तुकला और परिवेश का हिस्सा बनेगी। इस प्रकार उनके लिए यह ग्रिड संरचना परम शांति, व्यवस्था और आत्मिक स्वतंत्रता को प्राप्त करने का एक माध्यम थी।

 

जबकि उमेश वर्मा जी के चित्रों में ज्यामितीय विन्यास और आकृतियों का जुड़ाव एक अत्यंत गहन कलात्मक विन्यास को सामने लाता है , यह वे चित्र है जिनसे उनकी एक पहचान बनती दिखाई देती है। उनकी कला साधना में रेखाओं का अनुशासन और ग्रिड का ढांचा एक धरातल निर्मित करता है, जो कैनवास को कई स्तरों पर विभाजित कर देता है। पीट मोंड्रियन ने जहाँ अपनी कला को द्विविमीय सतह, सीधी रेखाओं और प्राथमिक रंगों के शुद्ध अमूर्तन तक सीमित रखा, वहाँ उमेश वर्मा जी इस ढाँचे को एक सर्वथा भिन्न दिशा प्रदान करते हैं। उनके चित्रों में यह ज्यामिति एक ऐसे रंगमंच की तरह कार्य करती है, जिसमें जीवन के विभिन्न रूप अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

 

चित्रों के सूक्ष्म अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि उनके यहाँ ज्यामिति पूरी तरह से त्रि-आयामी और गतिशील है। कैनवास पर खिंची महीन पारदर्शी रेखाएँ साधारण वर्गाकार आकृतियों के निर्माण के स्थान पर जटिल घन, बहुआयामी जालियाँ और ब्रह्मांडीय अंड जैसे आकारों को रचती हैं। इस यांत्रिक और सूक्ष्म संरचनात्मक विन्यास के भीतर वे हंस, कमल, चक्राकार कुंडली और ध्यानमग्न बुद्ध जैसी जैविक तथा आध्यात्मिक आकृतियों को समाहित करते हैं। यह संयोजन वास्तुकला के कड़े अनुशासन और चेतना के सहज प्रवाह के सुंदर समन्वय को रेखांकित करता है। एक और कलाकार जी आर संतोष का उनके करीब का दिखाई देता है। उमेश जी की कला में जहाँ ग्रिड और ज्यामितीय रेखायें एक बौद्धिक संतुलन बनाती हैं, वहीं संतोष जी के चित्रों में ग्रिड, त्रिकोण, वृत्त और वर्ग मिलकर एक आध्यात्मिक और तांत्रिक ज्यामिति का निर्माण करते हैं। उनके यहाँ ग्रिड ब्रह्मांडीय ऊर्जा और ध्यान का प्रतीक है।

 


बिरेन दे जो उनके शिक्षक भी रहे उनके नव-तांत्रिक चित्रों का प्रभाव उमेश वर्मा जी के कला-संसार पर पड़ना एक अत्यंत स्वाभाविक और गहरे कलात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। गुरु और शिष्य के बीच विचारों तथा दृश्य-भाषा का यह जीवंत आदान-प्रदान उनके चित्रों की बनावट में कई स्तरों पर प्रतिध्वनित होता है।

 

इस प्रभाव और दोनों की कला के अंतर्संबंधों को कुछ विशेष प्रवृत्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है। बिरेन दे के नव-तांत्रिक अमूर्तन की मुख्य विशेषता कैनवास के केंद्र में एक जाज्वल्यमान प्रकाश स्रोत या ऊर्जा पुंज का होना था, जहाँ से कोणीय और ज्यामितीय रेखाएँ फूटती हुई प्रतीत होती हैं। उमेश वर्मा जी के चित्रों में भी प्रकाश और ऊर्जा का यह केंद्रीय विन्यास साफ़ देखा जा सकता है। उनके यहाँ भी ज्यामितीय आकृतियाँ और यंत्र-जैसी संरचनाएँ कैनवास के मध्य भाग को एक चुंबकीय केंद्र में बदल देती हैं, जो दर्शक के ध्यान को भीतर की ओर खींचता है।


बिरेन दे ने पारंपरिक तांत्रिक प्रतीकों को आधुनिक अमूर्त ज्यामिति में ढाला था। उमेश वर्मा जी ने इस पद्धति को एक नया विस्तार दिया। उन्होंने बिरेन दे के विशुद्ध अमूर्त तांत्रिक ढांचे को स्वीकार करते हुए उसके भीतर जैविक रूपों, पारदर्शी घनों और सूक्ष्म चक्राकार कुंडलियों को पिरोया। उनके चित्रों में दिखने वाले जालीदार यंत्र और अंडाकार आकृतियाँ बिरेन दे की उसी नव-तांत्रिक चेतना का एक विकसित रूप प्रतीत होती हैं, जो ब्रह्मांडीय रहस्यों को टटोलती है।


बिरेन दे की कला में रंगों और रेखाओं का एक कठोर बौद्धिक अनुशासन था, जो तंत्र के आध्यात्मिक नियमों से उपजा था। उमेश वर्मा जी के चित्रों में भी यह संरचनात्मक अनुशासन पूरी प्रखरता से विद्यमान है। उनकी पारदर्शी रेखाएँ और बहुआयामी ग्रिड रूपात्मक प्रयोग होने के साथ-साथ एक गहरे दार्शनिक चिंतन को भी व्यक्त करते हैं। यह कलात्मक दृष्टिकोण सीधे तौर पर गुरु के प्रभाव को पुष्ट करता है, जहाँ कला एक दृश्य वस्तु होने के साथ आंतरिक खोजी प्रवृत्ति का माध्यम बन जाती है।

यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बिरेन दे की नव-तांत्रिक कला-दृष्टि उमेश वर्मा जी के चित्रों में एक अंतर्धारा की तरह प्रवाहित होती है। उन्होंने अपने गुरु के तांत्रिक अमूर्तन से ऊर्जा और ज्यामिति का पाठ लिया, और उसमें अपने स्वतंत्र रूपों, स्मृतियों तथा मानवीय संवेदनाओं को समाहित करके एक सर्वथा मौलिक दृश्य भाषा का सृजन किया।



इस रचनात्मक प्रयास की दार्शनिक विवेचना आंतरिक और बाह्य संसार के एकीकरण के रूप में की जा सकती है। कैनवास पर उपस्थित ज्यामितीय ढांचा तार्किक बुद्धि, सांसारिक व्यवस्था और ब्रह्मांडीय नियमों को दर्शाता है, तो वहीं उसके भीतर से प्रस्फुटित होते रूप मानवीय संवेदनाओं, स्मृतियों और आत्मिक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देते हैं। रेखाओं की पारदर्शिता यह आभास कराती है कि मनुष्य का अस्तित्व एक व्यापक वैश्विक संरचना से घिरा हुआ है, जिसके भीतर चेतना निरंतर प्रवाहित होती रहती है। इस प्रकार उमेश वर्मा जी के चित्रों में ज्यामिति और रूप का यह मिलन बौद्धिक संतुलन तथा आध्यात्मिक गहराई का एक विरल और अनूठा सामंजस्य प्रस्तुत करता है।

 

एक कलाकार किस तरह से विकास करता है उसे लेकर वे कहते है कि...

 

"विकास कोई उपलब्धि नहीं, जीवन की स्वाभाविक गति है। समय हर क्षण बदलता रहता है। जो बीत चुका है, वह लौटकर उसी रूप में उपस्थित नहीं होता और आने वाला समय भी अपने साथ नए अनुभव लेकर आता है। कलाकार भी इसी प्रवाह का हिस्सा है। उसके भीतर का जैविक समय, उसकी संवेदनाएँ, स्मृतियाँ, अनुभव और उसके चारों ओर बदलती दुनिया लगातार उसे रूपांतरित करती रहती हैं। यह परिवर्तन कभी उसे नई दिशाओं की ओर ले जाता है, कभी उसे अपने भीतर लौटकर देखने के लिए प्रेरित करता है। इसी सतत परिवर्तन में कलाकार की दृष्टि, उसकी भाषा और उसकी रचना का संसार आकार ग्रहण करता है।"

 

 उनका यह स्वभाव एक सहज विलक्षणता से अनुप्राणित था। जहाँ उनके समकालीन कलाकार प्रसिद्धि और धन अर्जन के लिए कृत्रिम ढोंग करते थे, वहीं वर्मा इन आडंबरों से सर्वथा मुक्त रहे। उन्होंने समकालीन कला की विसंगतियों और व्यवस्था की प्रखर आलोचना की। वे सभी कलाकारों को एक खुले और प्रगतिशील दृष्टिकोण के कारण अपने निकट समझते थे, परंतु कला जगत के व्यावहारिक यथार्थ में उनकी यह बेबाकी समकालीनों के लिए एक असहज स्थिति उत्पन्न करती थी।

 

उमेश वर्मा की कला-यात्रा व्यावसायिक तंत्र और बाज़ारू पैंतरेबाज़ी से सर्वथा मुक्त रही। जहाँ उनके दौर के कई समकालीन कलाकार तात्कालिक प्रसिद्धि, धन और दीर्घाओं के अनुकूल कला निर्माण में संलग्न थे, वहीं वर्मा ने अपनी कलात्मक स्वायत्तता से कभी समझौता नहीं किया। वे कला दीर्घाओं और नीलामी घरों के व्यावसायिक चक्रव्यूह से सदैव दूरी बनाए रहे। उनका अडिग विश्वास केवल अपनी मौलिक चिंतन-प्रक्रिया और सृजन की शुद्धता में था। कला संवाद के दौरान वे समकालीन कला की विसंगतियों पर अत्यंत प्रखरता और सुरुचिपूर्ण भाषा में अपनी बात रखते थे। उनका यह समझौताहीन दृष्टिकोण उन्हें अपने समय के कलाकारों में एक विशिष्ट और आदरणीय स्थान प्रदान करता है।

 

वे अपने विचारों को अत्यंत ऊंचे स्वर में और पूरे अधिकार के साथ व्यक्त करते थे, भले ही अन्य कलाकार उनकी बातों की गहराई को समझने से कतराता हो। उनकी भाषा अत्यंत सुरुचिपूर्ण और प्रवाह से युक्त थी, फिर भी कला समाज , कला मंचों पर उनकी इस तीखी , स्पष्टवादी संवाद शैली को वह महत्व प्राप्त नहीं हो सका जो मिलना चाहिए था। कला परिदृश्य में वर्ग संघर्ष का यह रूप अत्यंत सूक्ष्म और क्रूर होता है, जहाँ वैचारिक शुद्धता और सत्य को प्रायः उपेक्षित कर दिया जाता है। उनकी दीर्घकालीन अस्वस्थता और कला दीर्घाओं से उनकी दूरी एक सर्वविदित तथ्य थी। जब कोई सृजक सक्रिय परिदृश्य से ओझल हो जाता है, तब समाज उसकी सुध लेने की औपचारिकता से भी विमुख हो जाता है। वयोवृद्ध कलाकार अंततः एक एकाकी संसार में मृत्यु की प्रतीक्षा करने को अभिशप्त हो जाता है। यह कारुणिक स्थिति है। उदासीनता का भाव दिखना तत्कालीन कला जगत की आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति को उजागर करता है। वर्मा उस श्रेणी के सृजक थे, जिनके प्रति बाज़ारू आत्मीयता दर्शाना या जिनकी कलात्मक थाती पर गर्व का प्रदर्शन करना तात्कालिक लाभ से परे था।

 

2004 में कोच्चि, केरल में आयोजित कला के लिए राष्ट्रीय अकादमी पुरस्कार उन्हें काफी देर से मिला।

 

चित्रकार एस.के. साहनी के शब्दों में, "जब कला को एक व्यावसायिक वस्तु में परिवर्तित कर दिया जाता है और कलाकार का संपूर्ण मूल्यांकन उसकी कृतियों की बिक्री और बाज़ार के मूल्यों के आधार पर तय होने लगता है, तब समीक्षकों द्वारा ऐसी यथार्थवादी समीक्षाओं का आना स्वाभाविक है। इन साहसिक और स्पष्ट कथनों के आलोक में भी, उमेश वर्मा का स्मरण सदैव एक ऐसे सच्चे, साहसी और करुणा से ओत-प्रोत कलाकार के रूप में किया जाएगा, जिन्होंने कला को बाज़ार की वस्तु बनाने के स्थान पर उसे अपने जीवन की सर्वोच्च साधना माना।"

 

संस्थानों और दीर्घाओं से जुड़े लोग प्रायः किसी कलाकार का स्मरण तभी करते हैं, जब वह व्यावसायिक सफलता के शीर्ष पर विराजमान होता है। यह आत्मग्लानि से भरी एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिससे यह धारणा पुष्ट होती है कि कलाकार को उसके जीवनकाल में न्यायसंगत सम्मान प्राप्त करने से वंचित रखा जाता है गायतोंडे जी और भी अन्य इसका बड़ा उदाहरण। सत्य यह है कि भौतिक संपदा का मूल्य केवल जीवित संसार तक सीमित है; देहावसान के उपरांत वह निष्प्रयोजन हो जाती है।

 

यह विचार मेरे मन में गहराई से अंकित हो गया कि विस्मृति का यह दंश कला से जुड़े स्वाभिमानी कलाकारों को झेलना ही पड़ता है। उमेश सर के संदर्भ में इसे समझे तो इसका एक कारण उमेश वर्मा की वह वैचारिक स्थिति थी, जिसमें समय के साथ एक ठहराव आ गया था ऐसा मुझे लगता है। उनकी प्रखर बुद्धिमत्ता के बावजूद, लोग उनसे दूरी बनाने लगे थे क्योंकि उनकी सोच में समकालीन समय के अनुसार परिवर्तन और नवीनता का समावेश रुक गया था। वे जीवन और कला के अपने मूलभूत सिद्धांतों पर अत्यंत दृढ़ता के साथ टिके रहे। एक रचनात्मक व्यक्ति के लिए समय के साथ स्वयं को अद्यतन करना और कलात्मक नवीनता को स्वीकार करना अत्यंत आवश्यक है। यह एक ऐसा जीवन-पाठ है जिसे सीखने में कई मनीषी असमर्थ रह जाते हैं। विदा होने की कला को न सीख पाना और निरंतर पहचान की आकांक्षा रखना अंततः एक त्रासद स्थिति को जन्म देता है। यह अत्यंत दुखद है कि उमेश वर्मा जीवन के अंतिम दिनों में पूर्णतः शय्याग्रस्त होने से पूर्व इस सत्य को आत्मसात कर पाता है।

 

प्रभाकर कोलते सर के किसी एक चित्र के विन्यास से कहीं आगे जाकर दूसरे कलाकार उमेश वर्मा सर के चित्र संसार के सिरे से मिलते है जहां कैनवास एक ऐसा जीवंत प्रस्थान बिंदु बन जाता है जहाँ से स्मृतियों, संवेदनाओं और कलात्मक आंदोलनों की कड़ियाँ आपस में जुड़ने लगती हैं। उस एक धरातल से बात शुरू होती है और रास्ता बनाते हुए वह उमेश वर्मा के चित्र संसार में प्रवेश कर जाती है। इस जुड़ाव से उनकी पूरी कला यात्रा और जीवन का जीवंत खाका हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है, और वह सृजन हमसे सीधे संवाद करने लगता है।

 

​जब आप किसी एक कलाकार के अंतर्जगत को टटोलते हैं, तो उनका एकांत हमेशा उनके अपनों से भरा होता है। उनके परिवेश में सांस लेने वाले उनके दोस्त, उनके सहयात्री और उनके साथ जीवन को गहराई से जीने वाले साथी कलाकार स्वतः ही उस विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। इस बहाने उन सभी की कला दृष्टि और संघर्षों की बात भी साथ-साथ चलती रहती है। यह एक ऐसा अदृश्य सूत्र है, जिसे थामकर यदि हम आगे बढ़ें तो संवाद की प्रक्रिया गहरी होती चली जाती है। यह संवाद एक कलाकार से दूसरे कलाकार तक और दूसरे से किसी तीसरे तक अनवरत रूप से चलता रहता है।

 

​इतिहास और चर्चाओं का केंद्रबिंदु प्रायः वे कलाकार होते हैं जो सफलता के सर्वोच्च शिखर पर चमक रहे हैं। हर कोई उन पर बात करता है। मुझे लगता है कि कलाकार की आंखों की कोरों पर नमी होनी चाहिए जिससे दृष्टि में मानवीय मूल्य बचे रहे। इसके समांतर, उन शिखरों की भव्यता को बनाए रखने के लिए जमीन के भीतर एक ऐसी नमी की आवश्यकता होती है जो पूरी कला संस्कृति को सींचती है। कुछ कलाकार कला जगत के उस नेपथ्य की तरह होते हैं जो सामने दिख रहे दृश्य को सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं। वे खुद को सुर्खियों से दूर रखकर भी दृश्य कला के भीतर की मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों को बचाए रखते हैं। यह नमी हमारी देखने की दृष्टि को एक आर्द्रता देती है। जब हम इन कलाकारों के काम को देखते हैं, तो हमारी पलकों के कोरों पर वह नमी तैर आती है जो कला के सच्चे और निश्छल स्वरूप से पैदा होती है कला जगत में बाजारवाद के बीच जो थोड़े-बहुत मानवीय सरोकार बचे हैं, वे इन्हीं मौन साधकों की बदौलत सुरक्षित हैं।

 

इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य उन कलाकारों के योगदान को रेखांकित करना है जिन पर अक्सर मुख्यधारा में उतनी बात कम हो पाती है, जबकि वे इसके पूर्णतः अधिकारी हैं। वे कलाकार अपने काम की प्रामाणिकता और गहन साधना के बल पर इस आदर के पूरी तरह हकदार हैं। एक चित्र से शुरू हुई यह बात जब पूरी कला पीढ़ी के जीवन संघर्ष को समेटती है, तब जाकर कला का इतिहास अपने सच्चे अर्थों में पूरा होता है। यह सिलसिला लगातार चलते रहना चाहिए ताकि सृजन की इस परंपरा में हर जरूरी आवाज को अपनी जगह मिल सके।


Photos courtesy of Google.

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The English translated version will be available as a separate article within a week.



Rajesh Eknath is a Freelance artist based in Pune with many solo and group exhibitions in India and abroad. He has curated many Indian and international exhibitions and festivals. He regularly writes articles for newspapers and posts articles on the social media about art and artists.

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