देश के दूसरे सबसे महंगे चित्रकार रज़ा थे

- विमल कुमार


उनकी जन्मशती इस वर्ष मनाई जा रही है और उनके पैतृक स्थान मंडला में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं


क्या आपको मालूम है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के चित्रकार सैयद हैदर रज़ा की पहली पेंटिंग मात्र 40 रुपये में बिकी थी लेकिन उनके इंतक़ाल के बाद उनकी ही एक पेंटिंग 29 करोड़ रुपये में बिकी थी और वह उन दिनों देश के संभवतः सबसे महंगे चित्रकार रहे? पहले राजा रवि वर्मा, तैयब मेहता, मकबूल फिदा हुसैन आदि की गिनती देश के महंगे चित्रकारों में होती रही है। बाद में वासुदेव गायतोंडे ने रज़ा साहब का वह रिकॉर्ड तोड़ दिया था। उनकी पेंटिंग 31 करोड़ रुपये में बिकी।



हाल ही में कलाकार विदुषी यशोधरा डालमिया द्वारा रज़ा साहब की पहली आधिकारिक जीवनी "द जर्नी ऑफ एनआईकोनिक आर्टिस्ट" अंग्रेजी में आई है जिसमें लिखा गया कि 1943 में मुंबई आर्ट सोसाइटी की एक चित्र प्रदर्शनी में रज़ा के दो वाटर कलर चालीस-चालीस रुपये में बिके थे जबकि उन दिनों वे एक्सप्रेस ब्लॉक स्टूडियो में काम करते थे और उनकी तनख्वाह 40 रुपये प्रति माह थी जिसके लिए उन्हें रोज 8 से 10 घण्टे काम करना पड़ता था। लेकिन उनकी किस्मत देखिये कि जिस कलाकार के पास अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए कभी पैसे नहीं होते थे, उनके मरने के बाद 2018 में न्यूयॉर्क में एक नीलामी में उनकी पेंटिंग "तपोवन " 29 करोड़ रुपये में बिकी थी। उन्होंने यह पेंटिंग 1972 में बनाई थी। बाद में यह रिकॉर्ड टूटा। 1983 में लंदन में उनकी एक पेंटिंग 16 करोड़ 30 लाख रुपये में बिक चुकी थी जो उस समय का भारतीय रिकॉर्ड था। 4 साल बाद न्यूयॉर्क में ही उनकी एक पेंटिंग 21 करोड़ में बिकी थी। इस तरह रज़ा ने मात्र 40 रुपये की पेंटिंग से अपनी कला यात्रा शुरू करके 29 करोड़ रुपए पर पूरी की। यह अलग बात है कि 23 जुलाई 2016 में ही उनका इंतकाल हो चुका था लेकिन उनके जीवन काल मे उनकी पेंटिंग कुल मिलाकर 20 करोड़ रुपए से अधिक में बिक चुकी थीं।


तपोवन, 1972


लेकिन किसी आर्टिस्ट को उनकी पेटिंग की कीमत से नहीं आंका जाना चाहिए। कीमतों का खेल तो बाजार का खेल है। नंद लाल बोस, यामिनी राय, बिनोद बिहारी मुखर्जी, बेंद्रे, के के हेब्बर या भवेश सान्याल की पेंटिंग गायतोंडे की तरह 31 करोड़ों में न बिके तो इससे उनका योगदान कम नहीं हो जाएगा।

मध्य प्रदेश के मंडला में 22 फ़रवरी 1922 में जन्मे रज़ा की यह जन्म शती वर्ष है और उन पर एक आधिकारिक जीवनी आयी है। रज़ा फाउंडेशन ने रज़ा साहब की जन्म शती के वर्ष में 21 जुलाई से मंडला में कार्यक्रम शुरू किया है जो 23 जुलाई तक चला। फाउंडेशन ने उनकी स्मृति में गत वर्ष से ही उन पर अनेक कार्यक्रम और व्याख्यान शुरू किए हुए हैं।


किताब के अनुसार रज़ा साहब की परवरिश एक ऐसे परिवार में हुई जो अपने मूल्यों में बहुत उदार और धर्मनिरपेक्ष किस्म का था। साथ ही भारतीय संस्कृति में रचा बसा था। यही कारण है कि रज़ा साहब को रामचरितमानस पढ़ने मंदिर जाने आदि की भी छूट थी और बचपन में उन्हें अपने शिक्षक के कारण हिंदी साहित्य में भी रुचि पैदा हो गई थी और वह निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा आदि की रचनाएं पसंद करने लगे थे। उनके परदादा बहादुर शाह जफर के मुलाजिम थे और गालिब आदि के संपर्क में भी थे।


रज़ा साहब के पिता जंगल के रेंजर थे इस नाते पर्यावरण का असर उनके कोमल संवेदनशील मन पर पड़ा तथा उसने उनके चित्रकार मन को प्रेरित किया। 1939 में उन्होंने नागपुर स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया जहां कला के प्रति उनकी दिलचस्पी अधिक जागी और उन्हें मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लेने के लिए एक सरकारी फ़ेलोशिप भी मिली। वह वहां दाखिला लेने के लिए 1943 में मुंबई पहुंचे लेकिन विलंब होने के कारण उनका दाखिला तब नहीं हो सका और उनकी फैलोशिप भी खत्म हो गयी। इस बीच उनके पिता 1942 में गुजर चुके थे और उससे एक वर्ष उनकी माता भी गुजर चुकी थीं। इस नाते उन्होंने अपना भरण पोषण खुद करने का फैसला किया और एक स्टूडियो में नौकरी करने का निर्णय लिया। 1943 से लेकर 1950 तक उनका जीवन काफी संघर्षपूर्ण बीता लेकिन यहीं रहकर उस जमाने के चर्चित कलाकारों से उनकी भेंट हुई जो बाद में उनके गहरे मित्र बने। इनमें के एच आरा से लेकर सूज़ा, तैयब मेहता, अकबर पदमसी, मकबूल फिदा हुसैन, गायतोंडे, कृष्ण खन्ना, रामकुमार आदि शामिल है।


रज़ा साहब ने 1947 में जेजे स्कूल आफ आर्ट में दाखिला लिया और 1948 में वहां से डिग्री हासिल की। गोआ के सूजा ने 1947 में ही प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना की जिसमें जुड़ने के बाद रज़ा की कला में निखार आया और उन दिनों उन्होंने मुंबई शहर को लेकर कई सुंदर आयल पेंटिंग भी बनाईं। इससे पहले 1942 में ही उनकी शादी रिश्ते में दूर की एक बहन से कर दी गई थी लेकिन जब भारत पाक विभाजन हुआ तो रज़ा साहब पाकिस्तान नहीं गए जबकि उनके तीनो भाई बहन और उनकी पत्नी भी पाकिस्तान चली गईं। यह रज़ा का हिंदुस्तान प्रेम था। रज़ा साहब का कहना था कि वह गांधी के देश को छोड़कर पाकिस्तान नहीं जा सकते हैं। असल में गांधी और नेहरू का भी रज़ा साहब पर गहरा असर था। उनकी एक पेंटिंग "हे राम" शीर्षक से गांधी पर है और बाद में भी कुछ चित्र उन्होंने गांधी को लेकर बनाए हैं लेकिन 1950 में एक सरकारी फेलोशिप पाकर रज़ा साहब पेरिस चले गए और वे वहीं जाकर बस गए। उनकी पहली पत्नी से उनकी नहीं बनी और वह खुद पाकिस्तान चली गयीं थीं। रज़ा साहब ने एक फ्रेंच महिला जानीन मोंगिलात से शादी कर ली और जब तक वह जिंदा रहीं वह पेरिस में ही रहे।


हे राम, 2013


जानींन के निधन के बाद वह भारत वापस आए और यही आकर फिर बस गए। इस बीच अपनी पत्नी के साथ वह कई बार भारत आए थे और उनके साथ उन्होंने अपने बचपन में गुजारे गए शहरों का भी दौरा किया था। उन्होंने पत्नी के साथ भारत में खूब भ्रमण किया था। रज़ा साहब हिंदी साहित्य के गहरे प्रेमी थे और उन्होंने निराला, पंत, महादेवी से लेकर केदारनाथ सिंह और मुक्तिबोध आदि की कविताओं का भी अध्ययन किया था और उनकी पेंटिंग में इन कवियों की पंक्तियां भी देखी जा सकती हैं। मकबूल फिदा हुसैन की तरह रज़ा साहब पर भी भारतीय प्रतीकों को बदनाम करने के आरोप लगे लेकिन हुसैन की तरह रज़ा साहब भी सच्चे भारतीय और धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। उनकी पेंटिंग भारतीय परंपरा में रची-बसी थी। यहां तक की उन पर तांत्रिक कला करने का आरोप लगा लेकिन उन्होंने हमेशा खुद को तांत्रिक पेंटिंग से अलग माना और एक बार तो उन्होंने नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में तांत्रिक पेंटिंग प्रदर्शनी में अपनी पेंटिंग देने से मना भी कर दिया था। फ्रांस में रहने के बाद वह एक बार फिर अमूर्त कला की तरफ मुड़े और बाद के दिनों में उन्होंने अमूर्त चित्रकला में बिंदु को बड़ी प्रमुखता दी। लेकिन उनकी पेंटिंग कहीं से तांत्रिक पेंटिंग नहीं थीं।

रज़ा साहब ने विदेशों में भारतीय चित्रकला का नाम उसी तरह रौशन किया जिस तरह रविशंकर ने दुनिया मे भारतीय संगीत का। रज़ा साहब को पद्मविभूषण से नवाजा गया। हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपई से रज़ा की गहरी मित्रता रही। उन्होंने अपनी संपत्ति रज़ा फाउंडेशन को दे दी। रज़ा फाउंडेशन ने हिंदी साहित्य के प्रचार प्रयास के लिए अनेक योजनाएं चलाई है। इस तरह एक देशभक्त चित्रकार ने मरने के बाद भी अपना सब कुछ देश को दे दिया है।

 

Vimal Kumar is a poet with six books of poems among the 12 published books that he has written. At present he is working as a freelance journalist and an active poet. He retired from UNI after 35 years of service as a journalist, of which he worked 20 years covering the Indian Parliament.

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